गुरुवार, 28 जून 2018

लोधीजाति:एक समीक्षा - लोधी समाज और राजनीति (प्रकरण सात)

   समाज से राजनीति है, राजनीति से समाज नहीं। समाज से ही राजनीति का अस्तित्व है, राजनीति से समाज का अस्तित्व नहीं है। इसलिए लोधी समाज के जो लोग राजनीति की चकाचौंध से प्रभावित हैं , जिनकी आँखें राजनीति काली छाया को रौशनी समझ रही है ,वे अच्छी तरह से जान लें कि राजनीति भगवान नहीं है। उनकी नज़र में राजनेता और राजनीति भगवान है, वे अज्ञानी हैं, अनाड़ी हैं, अपरिपक्व हैं, और अन्य सभी प्रकार की समस्त योग्यताओं से विहीन हैं। जैसा कि ओशो ने एक स्थान पर सटीक मन्तव्य दिया है: ' राजनीति उनके लिए है , जिनके लिए कुछ और नहीं। जो मूर्ति नहीं बना सकते, जो चित्र नहीं रंग सकते, जो गीत नहीं गा सकते, जो कुछ भी नहीं कर सकते - उन सब अयोग्यों के लिए राजनीति है।आखिर अयोग्यों के लिए भी तो कुछ होना चाहिए जिनमें और कोई योग्यता नहीं है, उनमें राजनीति की योग्यता होती है।राजनीति के लिए बुद्धि नहीं चाहिए। क्योंकि  बुद्धिमान आदमी इतनी बेईमानी नहीं कर सकता; कुछ तो सोचेगा बुद्धिमान आदमी इतने धोखे नहीं दे सकता। कुछ तो विचारेगा बुद्धिमान आदमी, इतने झूठ नहीं बोल सकता।आखिर खुद की आत्मा कचोटेगी! और राज-नीति तो सिर्फ झूठे आश्वासन हैं। सिर्फ़ झूठ पर झूठ। अत्यंत सोई हुई चेतना चहिए राजनीति में सफ़ल होने के लिए।'
   इससे स्पष्ट है कि राजनीति में सफ़ल होने के लिए आदमी को धोखेबाज, चार सौ बीस, झूठा, छल - फरेबी, अपराधी वृत्ति का व्यक्ति होना चाहिए। सत्यवादी, भले, छल-कपट से दूर ईमानदार आदमी का यहाँ कोई काम नहीं है। लोधी- समाज राजनीतिक दृष्टि से इसीलिए पिछड़ा  हुआ है क्योंकि उसके जातीय गुणों में झूठ, छल कपट ,आदि नहीं है। जैसे जैसे इन  तत्वों का समावेश वहाँ हो रहा है, वैसे वैसे राजनीतिक चेतना आ रही है, लेकिन उस राजनीतिक चेतना का लोधी जाति को विशेष लाभ नहीं हो रहा है। प्रत्यक्ष रूप से देखा जाए तो बिना किसी लोधी राजनेता का नाम लिए हुए कहूँगा कि जितने भी राजनेता मुख्य मंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक आदि हुए हैं, उनमें से आज तक कितनों ने समाज के लोगों का भला किया। सिवाय  इसके कि उन्होंने भी अन्य जातियों की तरह अपने परिवार और अपनी तिजोरियों पर ही विकास का  सारा दूध उँडेल दिया। बहुत अधिक अपने सम्बसन्धियों को भी कृतज्ञ किया । यदि उनके पास जाति के नाम पर  कोई आदमी ट्रांसफर, नियुक्ति और किसी अन्य छोटे मोटे कार्य के लिए गया तो उसेअपमान ,उपेक्षा, अपनेपन का सर्वथा अभाव, पारदर्शिता की दुहाई , ईमानदारी का छोंक, और कार्य में शत प्रतिशत असफलता ही हाथ लगी। उस स्वजातीय व्यक्ति को एक मिनट देना भी  भारी पड़ा नेताजी को। और हम लोधी जाति के लोग इतने अंधे और मूर्ख हैं कि गर्व से छाती फुलाए हुए पार्टी के झंडे को गले से लगाए हुए इतने गौरवान्वित महसूस करते हैं कि जैसे हमीं मुख्यमंत्री हों, मंत्री हों, विधायक हों और उधर दूसरा ही खेल हो रहा है , जहाँ बनियां, बामनों को गले लगाया जा रहा है। उनके सार काम किए जा रहे हैं, वहाँ सारा आदर्शवाद कहाँ चला जा रहा है! केवल स्वजातीय लोगों को आदर्श का आईना दिखाया जा रहा है। यह सब भोगा हुआ सच है, कोई काल्पनिक कहानी नहीं है।ऐसी राजनीति की कीचड़ में केवल उसी प्रकार के लोगों का अस्तित्व सम्भव है। दो वक्त की मेहनत की रोटी खाने वाले लोधी जाति के व्यक्ति को राजनीति में अंधाधुंध पैसा खर्च करने के लिए धन कहाँ है?  ईमानदारी से केवल दो वक्त की रोटी खाई जा सकती है, चुनाव नहीं लड़ा जा सकता। पर धन और पराई सम्पत्ति को छीनकर ही धनी हुआ जा सकता है। इस प्रकार राजनीति में  ईमानदारी के लिए स्थान कहाँ? युग के अनुसार समय के साथ चलने के लिए  राजनीतिक जागरूकता आवश्यक है। किंतु अपने चरित्र, स्वाभिमान, सत्य, ईमानदारी को दांव पर लगाकर राजनीति  करने का कोई औचित्य नहीं है।

शुभमस्तु!
लेखक © डॉ. भगवत स्वरूप"शुभम"
27.06.2018●7.15PM

शुक्रवार, 22 जून 2018

लोधी जाति :एक समीक्षा - सर्वोपरि शैक्षिक जागरण (प्रकरण छः)

शिक्षा मानव जीवन के विकास के लिए संजीवनी है। जिसने भी शिक्षा के महत्त्व को समझा है, सदैव से समाज में वही अग्रणी रहा है, है, और रहेगा।जिन जातियों को समाज में आज सर्वश्रेष्ठ का दर्जा प्राप्त है , वे सभी जातियाँ शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी हैं। जिन जातियों और समाजों को आज राजनीतिक रूप से पिछड़ा अथवा दलित माना जाता है, वह यों ही नहीं है।सदैव से वही आगे रहा है , जिसने अच्छी शिक्षा प्राप्त की। सवर्ण कही जाने वाली ब्राह्मण जाति ने तो अपना पेशा ही अध्य्यन करना और कराना बनाया । जो युग -युग से आज भी जारी है। इसी प्रकार अन्य क्षत्रिय, वैश्य या दलित वर्ग ने शिक्षा के महत्व को समझा ,वे किसी की मुँहताज नहीं हैं। माना कि युग के अनुरूप क्षत्रिय जातियों का कर्तव्य युद्ध करना और रक्षा करना माना गया ,लेकिन जब युग बदलता है तो हमारी उन सारी प्रवृत्तियों में भी परिवर्तन आजाना चाहिए। प्राचीन काल के वातावरण और आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उस समय राष्ट्र रक्षा औऱ आत्मरक्षा हेतु क्षत्रियों के लिए युद्ध आवश्यक रहे होंगे, किन्तु क्या आज के परिवेश में भी वही सब करना चाहिए ?इसी संस्कार के अहंकारवश यदि लोधी समाज आगे बढ़ना चाहता है तो ये उसकी सबसे बड़ी भूल होगी।परिणाम ये देखने को मिल रहे हैं कि वे आपस में लड़ भिड़ कर क्षरित हो रहे हैं।कोई किसी की मेड जोतकर अपनी होशियारी दिखा रहा है तो कोई-कोई एक एक बालिश्त जमीन के लिए जीवन की सारी जमा पूँजी कचहरी में बरवाद कर रहा है।छोटी-छोटी बातों पर परस्पर लड़ाइयां करके कमजोर हो रहे हैं।
जिस पैसे को बच्चों की शिक्षा पर व्यय करके उनका जीवन सुधार सकते थे,वह कोर्ट कचहरी में वकीलों पर बरवाद कर रहे हैं।अपने अहंकार में लड़ना -भिड़ना ही उनके जीवन का उद्देश्य बन कर रह गया है। यदि सर्वेक्षण कराया जाए तो देश की अदालतों में जितने भी मुकदमे चल रहे हैं, उनमें सबसे अधिक संख्या लोधी समाज सहित अन्य पिछड़ी जातियों की ही मिलेगी। यह कहने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है कि इस स्तर पर यदि सबसे निम्न स्तर पर यदि कोई है तो वह लोधी ही है।कोरी हेकड़ी और ऐंठ से भरा हुआ लोधी इन सब बातों को सुनने और समझने के लिए भी तैयार नहीं है।
माना कि थोड़ा - बहुत असर लोधी समाज पर पड़ा भी है , तो उसमें भी उसकी वरीयता अपने पैतृक पेशे कृषि पर ही है। इसलिए वह जिन विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाता है, वे गिरे हुए स्तर के विद्यालय हैं। निजी विद्यालय शिक्षा के नाम पर कोढ़ हैं, जिनमें न तो पढ़ाई होती है और न ही कोई पढ़ाता है, क्योंकि विद्यालय या महाविद्यालय मालिकों को केवल और केवल फीस चहिए।बच्चे के व्यक्तित्व विकास, शिक्षा और चारित्रिक विकास से कोई मतलब नहीं है।न वहाँ शिक्षक हैं ,और न विद्यार्थी।यदि शिक्षक हैं भी तो सर्वथा अयोग्य, पढ़ाने हेतु अपात्र औऱ वे लोग हैं ,जो बेरोजगार होने के कारण अपने बीबी -बच्चों को दो वक्त की रोटी देने के लिए अपने दिन गुजार कर समय पास कर रहे हैं।जब स्कूल कालेज में पढ़ाई नहीं होगी तो स्वाभाविक है बच्चे की योग्यता शून्य होगी।
इस कमी को पूरा करने के लिए उन्हीं अपात्रों द्वारा आधी अधूरी नकल कराके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है।जिन डिग्री कक्षाओं के बच्चों को अपने विषय (ज्योग्राफी, बॉटनी, फिजिक्स) आदि की सही स्पेलिंग भी नहीं।आती हो, उनसे क्या आप कुछ अपेक्षा कर सकते हैं। यह स्थिति प्रयोगात्मक मौखिक परीक्षा की है। ये सभी बातें काल्पनिक नहीं हैं, लेखक ने अपनी आँखों के सामने यही नज़ारा देखा औऱ समझा है। यद्यपि प्रदेश में बेसिक स्तर से ही शिक्षा की यही दुर्व्यवस्था है,औऱ दशमोत्तर तथा उच्च शिक्षा में बहुत बुरा हाल है।इस सबका दुष्परिणाम यदि भोग रही हैं ,तो वे सभी लोधी समाज जैसी पिछड़ी औऱ दलित जातियाँ हैं।लोधी समाज के लोग ऐसी ही संस्थाओं में बच्चों को भेजकर उनके पैरों में खुद कुल्हाड़ा मार रहे हैं।इतनी आज़ादी और बरबादी के मौके भला अच्छे शिक्षा संस्थानों में कैसे मिल सकते हैं? इनमें पढ़ता हुआ लोधी बच्चा घर पर बाप के आदेश पर पहले खेत में धान की रोपाई करवाता है, आलू गढ़वाता है, आलू ईख में पानी लगवाता है, और पढ़ाई को छोड़कर घर के सारे काम करवाता है।ऐसी आज़ादी भला और कहाँ? माँ -बाप कभी ये नहीं कहते कि कभी पढ़ भी लिया कर। जिस समाज के लोगों का शिक्षा के प्रति ये रवैया हो, वह समाज भला आगे कैसे बढ़ सकता है! ऐसा है वर्तमान लोधी समाज। माना कि किसान अन्नदाता है, लेकिन देश में सर्वाधिक शोषण भी उसीका हो रहा है।अन्न, सब्जी ,फल आदि का उत्पादन भी जरूरी है।किन्तु घर , परिवार और बच्चों के भविष्य को दाँव पर लगाकर तो ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। जो जातियाँ आज तक सिर्फ खेती किसानी के बल पर जीती रहीं, वे सभी आज पिछड़ी हुई हैं। लेकिन तथाकथित सभी सवर्ण जातियाँ कृषि को छोड़कर या गौण मानकर चलीं , वे प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी हैं।लोधी समाज को उन सबसे प्रेरणा लेनी होगी, और अपनी नाव को विकास की गंगा में उतारने से पहले शिक्षा की पतवार को मजबूती के साथ ग्रहण कर पार उतरना होगा सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आए ,तो उसे भूला हुआ नहीं कहते।

शुभमस्तु!
लेखक © डॉ.भगवत स्वरूप राजपूत "शुभम"
22.06.2018 ●9.15 पूर्वान्ह।

बुधवार, 20 जून 2018

लोधी जाति :एक समीक्षा - प्रकृति और विकृति (प्रकरण पांच)

   इस बात से सभी भिज्ञ हैं कि लोधी एक पिछड़ी जाति है।अहंकारवश कोरा दम्भ भरने से वह अग्रणी नहीं हो जाएगी।इस जाति की प्रकृति ही सरलता से भरी हुई है। वह छल -कपट से दूर एक सीधी और सरल जाति है।इसी सिधाई और सरलपन के कारण उसका शोषण हुआ है और आज भी हो रहा है। जंगल का नियम है कि जंगल में पहले वे पेड़ ही काटे जाते  हैं, जो सीधे होते हैं।इस सीधेपन की अच्छाई ने आज तक उसका पतन ही किया है। सही शब्दों में यदि कहा जाए तो उसकी ये प्रकृति ही उसकी विकृति बन गई है।गुण अवगुण बन गया। युग की मांग के अनुरूप उसका ये गुण उसके शोषण और अप्रगतिशीलता का कारण बन गया है।सच्चाई , ईमानदारी, परिश्रमशीलता, लगन शीलता, विशुद्धता, कर्मठता आदि बहुमूल्य गुणों के बावजूद उसमे कुछ विकृतियां भी बुरी तरह से घर कर गई  हैं।इन विभिन्न विकृतियों की ओर यदि दृष्टिपत्व किया जाए तो निष्कर्ष यही  निकलता है कि उसके पिछड़ेपन के मूल में अनेक कारण हैं। जिन पर क्रमशः दृष्टिपात करना परमावश्यक है।
1. सगोत्र विवाह पद्धति।
2. शिक्षा की ओर ध्यान न देना।
3. सामिष तथा तामसी आहार का आधिक्य।
4. सुरापान।
5. दहेज का लेनदेन।
6 .मृत्यु भोज खाना औऱ खिलाना
7. परस्पर ईर्ष्या और वैमनस्य का भाव रखना।
8.सामाजिक एकता का अभाव।
9. किसी सामर्थ्यवान लोधी द्वारा किसी असहाय या गरीब की मदद नहीं करना।
10.अन्य समाजों में स्वजाति को छिपाना।
11.कछुआवृत्ति में जीवन -यापन करना।
12.जड़वादिता का समावेश।
13.प्रगतिशील सोच का अभाव।
14. रूढ़ियों को बंदरिया के मरे हुए बच्चे की तरह गले में लटकाए फिरना।
15. दहेज का लेना और देना।
16. कम आयु में ही बच्चों के विवाह कर देना।
17.संकीर्ण सोच की मानसिकता।
18.बुजुर्गों औऱ उच्च शिक्षित लोगों को सम्मान न देना।
19.अपने अहंकार में किसी को महत्व प्रदान न करना।
20.उच्च जातियों के पिछलग्गू बने रहकर उनकी चापलूसी में मगन रहना।
21. जुआ सट्टे में  धन  और परिवार  नष्ट होना।
   आदि आदि बहुत सी विकृतियां लोधी समाज में व्याप्त हैं।जिनके चलते उसके विकास में बाधा आ रही हैं।मैं पहले ही स्प्ष्ट कर चुका हूँ कि लोधी एक सीधी, सरल और भोली जाति है।और दूसरी ओर।वह भगवान भोलेश्वर की भक्त भी है।इसलिए इसका नाम।लोधी न होकर 'भोली होना चाहिए।उसके इसी गुण के चलते उसे अन्य समाज के लोगों द्वारा 'कबूतर जाति' की संज्ञा भी दी जाती है।जैसे कबूतर एक भोला और सरल पक्षी है,वैसे ही मानव जाति में लोधी जाति है। उसका शोषण कोई भी कर लेता है। जो उचित नहीं है।आज के युग में सीधे का मतलब मूर्ख ही होता है। इसलिए युग के साथ कदम से कदम मिला चलिए, अन्यथा प्रतियोगिता के इस युग में पीछे रह जाओगे।

💐शुभमस्तु!

✍🏼*लेखक ©:डॉ . भगवत स्वरूप  राजपूत " शुभम"

मंगलवार, 19 जून 2018

लोधी जाति :एक समीक्षा - संस्कार,संस्कृति औऱ सभ्यता (प्रकरण चार)

   लोधी जाति का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। ये जाति 
अपनी प्रारंभिक अवस्था से ही बहुत जुझारू, संघर्षप्रिय और कर्तव्य के प्रति निष्ठावान रही है।आर्थिक दृष्टि से विपन्न लोधी जाति अपने अस्तित्व और जीवनयापन के लिए जूझती रही है।उसका वही संस्कार उसमें आज भी विद्यमान है।जो काम उसको मिला अथवा किया,उसका निर्वाह उसने मनोयोगपूर्वक किया।किसी प्रकार की  हीला - हवाली ,बहानेबाजी या देरी किए बिना समयान्तर्गत उस कार्य को पूरा किया।परिश्रमी और शारीरिक श्रम करने के कारण उसने धूप, पानी, ठंडी,  गर्मी आदि की चिंता किए बिना अपना कार्य समय से पूरा किया,इसीलिए उसका रंग रूप साँवला हो गया।आज भी अधिकांशतः लोधी इसीलिए साँवले या और भी गहरे रंग के मिलते हैं। यह उसका कोई दोष नहीं ,अपितु जातीय गुणसूत्र गत विशुद्धता की पहचान है।अर्थात   लोधी    जाति     में वर्णसंकरता का अभाव है। इसीलिए ऐसा प्रतीत होता है कि वहाँ स्वगोत्र विवाह पद्धति लागू हुई। लोधी जाति के पुरुषों ने अन्य जाति धर्मों में विवाह - सम्बन्ध न कर केवल अपने ही गोत्र में किए। यही उसके पिछड़े पन का बीजारोपण हुआ।जो आज के प्रगतिशील युग में एक चिंतनीय स्थिति का रूप ले चुका है। हम युग के अनुरूप बदल नहीं पाए। यही बीज पीढ़ी दर पीढ़ी पुष्ट  होता हुआ आज की दशा को प्राप्त हुआ है।
   कुछ आततायियों द्वारा लोधी जाति के लोगों को सताया भी गया। आज कुछ जातियाँ जिन्हें अपना भगवान मानती हैं , उन परशुराम और उन्हीं जैसे चालक लोगों के द्वारा उन्हें मारा-  पीटा और सताया गया।उनका मनमाना शोषण भी किया गया। शोषित और पीड़ित होने के बाद उसने अपने अस्तित्व की रक्षा जिस किसी प्रकार की।सारा जीवन जब लड़ते -झगड़ते  ही बीत जाए तो पढ़ना-लिखना कैसे हो सकता है। रात और दिन दाल रोटी की चिंता में जूझते रहना है तो पढ़ाई कब औऱ कैसे हो?और दूसरी ओर आदिकाल में भी शिक्षा ग्रहण कराने और पढ़ाने का काम केवल ब्राह्मणों के हाथ में था। जब एकलव्य को शिक्षा के अधिकार से वंचित किया जा सकता है तो लोधी व्यक्ति को भी कौन प्रेम पूर्वक   शिक्षा दे सकता होगा? वही दुत्कार और    उपेक्षा ही उसे मिली और मिलती आई।
इस प्रकार लोधी जाति एकअविकसित,अप्रगतिशील और लकीर की फकीर रूढ़िवादी जाति  बनकर रह गई।

    शिक्षा विकास का प्रथम सूत्र है, जो पुराने संस्कारवश उसे प्राप्त नहीं हो सका। यही    संस्कार    उसका   वर्तमान भविष्यऔरअतीत बन गया।उसमें जड़वादिता का कीड़ा पनपने लगा अर्थात आगे बढ़ने की सोचने की क्षमता ही समाप्त हो गई। शिक्षा मानव को प्रगतिशील होने के नए नए मार्ग खोलती है। उसकी बुद्धि का विकास करती है। उसके अंदर वैज्ञानिक तरीके से कार्य करने की बुद्धि का विकास करती है।अपने अंदर ही अंदर सिमटकर रह जाने की कछुआवृत्ति का विनाश करती है। लोधी जाति की यह कछुआवृत्ति ही उसके विकास की बाधक है। इस  कछुआवृत्ति का विनाश तब तक नहीं हो सकता , जब तक लोधी अपने मुँह को शिक्षा की ओर नहीं  मोड़ लेते।
    प्राचीन काल से ही लोधी खेती -किसानी , पशुपालन, शाक सब्जी उत्पादन औऱ विक्रय करके ही संतुष्ट रहे।परम् संतोष वादिता इस जाति का एक विशेष गुण है, जो आज के युग में उसका अवगुण बन चुका है।इतना संतोष भी किस काम? जो विकास के कदमों में बेड़ियाँ ही डाल दे!
    जो जाति समय की गति के साथ नहीं चल पाती, युग के साथ कदम से कदम नहीं मिला पाती, उसका पिछड़ जाना स्वाभाविक है।यही कम या ज्यादा समस्त पिछड़ी जातियों के साथ हुआ है। लोधी जाति के साथ कुछ न्यादा ही हुआ।लोधी जागरण के ब्रह्म मुहूर्त में भी सोता रहा, और आज भी सो ही रहा है। जागरूकता न आने के बहुत से कारणों में पहला औऱ प्रबल कारण है शिक्षा के प्रति उदासीनता।इस जाति को सही दिशा देने वाले पथ-प्रदर्शकों का अभाव।जो आज शिक्षित और किसी क्षेत्र में आगे हैं , वे अपने और अपने परिवार के विकास के बीच सिमट कर रह गए हैं।वहाँ भी जातिगत कछुआवृत्ति ही  काम कर रही।अंगुलियों पर गिनने योग्य कुछ स्वजातीय बन्धुओं को छोड़कर कोई भी किसी को रास्ता  नहीं बता रहा। धीरे-धीरे पथ-,प्रदर्शन का रथ आगे बढ़ रहा है।जिससे कुछ आशा की किरणें जागीं हैं।
   हमारे संस्कारों से ही हमारी संस्कृति का विकास होता है। संस्कृति के विकास के पहिए की गति बहुत मंद मंद है। हजारों वर्षों से बने हमारे लोधी संस्कारों को इतनी सहजता और सरलता से नहीं बदला जा सकता।इसके लिए सैकड़ों वर्षों की आवश्यकता है।'करत - करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।रसरी आवत जात के सिल पर परत  निसान।' के अनुसार अगर संघर्ष जारी रहा तो कोई कारण नहीं कि लोधी समाज आज के समाजों के साथ कदम से कदम मिला कर न चल सके।
    शिक्षा से संस्कार बदलें , संस्कृति स्वतः बदल जाएगी।जब हम सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़े हुए रहते हैं , तो सभ्यता भी पिछड़ जाती है। हमें केवल संस्कार बदलने के लिए अच्छी शिक्षा ग्रहण करनी है। संस्कार ,संस्कृति और सभ्यता स्वयं बदल जाएगी।तो आइए एक कदम सुशिक्षा की ओर बढ़ाएं। अपनी हीनता बोध की भावना को नष्ट करें।हम किसी से कम सिद्ध नहीं होंगे।अपने लक्ष्य की ओर अपनी पैनी दृष्टिं  गड़ाए हुए आगे बढें,कल हमारा होगा।निराशावाद  के कुहासे को फाड़कर आगे आएं।
   "चरैवेति चरैवेति".

💐शुभमस्तु!
✍🏼लेखक©डॉ.भगवत स्वरूप  राजपूत "शुभं"

सोमवार, 18 जून 2018

लोधी जाति :एक समीक्षा - विवाह परम्परा और पद्धति (प्रकरण तीन)

   लोधी जाति के पतन औऱ अप्रगतिशीलता के बहुत से  कारणों  में से एक  है - लोधी जाति की विवाह परम्परा। सभी जानते और देखते हैं कि इस समाज में सगोत्र विवाह किए जाने की रूढ़ि की जलकुंभी लोधी-सरोवर पर आच्छादित है। कोई भी इस विवाह परम्परा पर विचार करने को तैयार नहीं है। बड़े -बड़े स्वजातीय नेता, विधायक, सांसद, मंत्री औऱ अधिकारी गण इस बिंदु पर मौन हैं।सम्मेलनों में लंबे -चौड़े भाषण किए जाते हैं , पर इस विषय पर कोई कुछ नहीं कहना चाहता। सभी गधे को गंगा में डुबकी लगवाकर गाय बनाने में लगे हुए हैं।युग -युग से लोधी संस्कार लड़ने -भिड़ने और खेती किसानी का रहा है। इसे सभी मानते हैं।इसलिए  यदि वे परस्पर लड़ भिड़कर  कोर्ट -कचहरी की शोभा बढ़ा रहे हैं तो आश्चर्य क्या ! उनका संस्कार लड़ने का है, पढ़ने का नहीं। न जाने कौन युग से सगोत्र विवाह की परंपरा पूर्वजों ने डाली होगी औऱ क्यों? कुछ भी कहा नहीं जा सकता।लेकिन अन्य उच्च जातियों और विवाह परम्पराओं  की ओर दृष्टिपात किया जाए तो हम सभी बहुत पीछे हैं।
   आज भी पथरिया पथरिया ही ढूंढता है, मथुरिया मथुरिया की खोज में भटकता है, किन्तु स्वगोत्र से इतर गोत्र में जाने की सोच भी नहीं सकता। इतर गोत्र विवाह करने पर अगली संतान में गुणसूत्र परिवर्तन होता है,इससे तीव्र बुद्धि, स्वस्थ शरीर के प्रतिभाशाली बच्चे जन्म लेते हैं।डी एन ए परिवर्तन से जातीय संस्कार भी बदलते हैं। इस विषय पर कहीं कोई गोष्ठी, बैठक, सम्मेलन नहीं होता।बस कैसे आई ए एस बनें , ये सिखाया जाता हैं। जड़ें कमजोर हैं, बच्चा संस्कार विहीन है, तो उसे कलक्टर कैसे बनाओगे।वह  ढंग से स्कूल कालेज की पढ़ाई भी पूरी कर पाए ,उससे यही अपेक्षा है। लेकिन हमारे तथाकथित  नेता और पथप्रदर्शक लोग उन्हें  आई पी एस , आई ए एस के सूत्र समझाना चाहते हैं। पहले संस्कारों  की जड़ों में खाद लगाने के लिए अंतरजातीय औऱ अन्तरगोत्रीय विवाह परम्परा पद्धति लागू करनी होगी।दुनिया औऱ अन्य समाजों की ओर देखकर जाति का  D N A बदलना होगा।अन्यथा लोधी जाति को सुधरने में सदियाँ बीत जाने पर भी संदेह रहेगा। भाषणों और कोरी दावत खाउ सम्मेलनों से कुछ भी नहीं होने वाला। संस्कार से विचार बदलेगा, विचार से आचार बदलेगा , आचार से समाज का वैवाहिक परिवार  बदलेगा औऱ परिवार से हमारा विकार झुलसेगा।मंचीय भाषण  तब सार्थक  होने लगेंगे।
   देखा होगा पेड़ों में व अन्य वनस्पतियों में कलम लगाकर नई वेरायटी तैयार की जाती है, यही बात मानव जाति और लोधी जाति पर भी लागू होती है।पशुओं की नस्ल सुधारने के लिए अन्य नस्ल के नरों से क्रॉस कराके सफलता पाई जाती है। विज्ञान के युग में विज्ञान के  इन सिद्धांतों को पालन करना ही होगा, अन्यथा भाषणों से विकास असम्भव है।

💐शुभमस्तु!
✍🏼लेखक ©:डॉ. भगवत स्वरूप राजपूत  "शुभम"

लोधी जाति:एक समीक्षा -जाति-वर्गीकरण (प्रकरण दो)

   देश के अनेक लोधी समाज के कार्यक्रमों , सम्मेलनों और महा सम्मेलनों  में प्रतिभागिता  करने के बाद मेरे अनुसार लोधी जाति को निम्नांकित चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:-
1.ब्राह्मण लोधी
2.क्षत्रिय लोधी
3.वैश्य लोधी
4.दलित लोधी

1.ब्राह्मण लोधी - इस वर्ग केदो उप वर्ग किए गए हैं-
(क) सुपर ब्राह्मण लोधी
(ख) अपर ब्राह्मण लोधी
ब्राह्मण लोधी वे लोधी  हैं,जो अपने को लोधी समाज का सबसे ऊपर का और सर्वश्रेष्ठ हिस्सा मानते हैं । इनमें सुपर ब्राह्मण लोधी वे हैं ,जो किसी प्रदेश में किसी भी राजनीतिक दल के विधायक, सांसद, केबिनेट मंत्री,राज्यमंत्री आदि हैं । ये अन्य अधिकारियों, विशेषकर लोधी अधिकारियों से चरण - चुम्बन करवाना अपना विषेशाधिकार समझते हैं।
अपर ब्राह्मण लोधी वे हैं, जो आई ए एस, आई आर एस, आई पी एस,  एस डी एम आदि हैं। ये सभी नेतागणों के आगे-पीछे चलने वाले अति महत्वाकांक्षी लोग हैं, जिनके पास लोधी समाज को आगे बढ़ाने के लिये अनेक रास्ते, सुझाव औऱ सुविधाएं हैं । लेकिन वे कितना पहुंचा पाते हैं या लोधी समाज जितना ग्रहण कर पाता है, ये अलग बात है। अधिकतर अधिकारी अपनी जाति छुपाकर नौकरी करते हैं और समाज के लिए इनकी कोई भी उपादेयता नहीं है। इसी लुका -छिपी में ये अपनी नौकरी पूरी कर लेते हैं और सेवा निवृत्त होकर घर बैठ जाते हैं। इन्हें समाज से कोई मतलब नहीं ।अपने पद के अहंकार में ये ऐसे डूबे रहते हैं कि अड़ौसी -पड़ौसी भी इन्हें दूर से ही सलाम करते हैं। सामने आने पर नमस्ते तो सभी कर लेते हैं, किंतु पीठ पीछे यही कहते सुने जातेहैं कि इसने समाज और जाति के लिए कुछ नहीं किया , केवल अपने बच्चों और रिश्तेदारों को नौकरी जरूर दिलवा दी। इस प्रकार अपर ब्राह्णण लोधी वर्ग के भी दो उपवर्ग हैं - एक समाजोपयोगी, दूसरा समाज अनुपयोगी।

2.क्षत्रिय लोधी  - क्षत्रिय लोधी  समाज का वह वर्ग है, जो नेताओं , विधायकों , सांसदों , मंत्रियों और बड़े लोधी अधिकारियों की छत्रछाया में पलता है औऱ आम लोधी जन को उन के पास भी नहीं फटकने देता। इस श्रेणी में उनके अंगरक्षक, पाले हुए गुंडे, बदमाश आते हैं। जो केवल उनकीं  रक्षा की भूमिका का निर्वाह करते हैं। लोधी समाज की रक्षा में उनका शून्य प्रतिशत योगदान है।हाँ, सामान्य लोधियो को डाँटने, फटकारने , कुर्सियों से उठाकर बाहर खड़ा करने , किसी कर भी मान -सम्मान की  खटिया खड़ी कर देने में इनका बहुत बड़ा योगदान हैं। सचिवालयों , संसदों में तेल मालिश और काले को सफेद करने में क्षत्रिय लोधियो की अहम भूमिका है।

3.वैश्य लोधी  - इस वर्ग के अंतर्गत वे लोधी आते हैं जो  चंदा दाता हैं ,या चंदा संग्राहक हैं।समाज के तमाम व्यवसायी, वकील, इंजीनियर आदि इस वर्ग के स्वामी हैं। निजी स्वार्थ या निस्वार्थ वश ये सभी धन एकत्रीकरण और व्यय का लेखा-जोखा रखते हैं।  केवल अपने बच्चों या किसी व्यावसायिक महत्वाकांक्षावश ये समाज का धन समाज की सेवा में लगाने में तत्पर रहते हैं।

4.दलित लोधी  - ये लोधी समाज का ऐसा उपेक्षित औऱ जनसेवी वर्ग है , जिससे दरियाँ बिछवाने , कुर्सियां लगवाने , टेंट     सजवाने आदि की व्यवस्था कराने का काम  वैश्य 
वर्ग द्वारा कराया जाता है। इस वर्ग में शिक्षक, क्लर्क तथा अन्य छोटे कर्मचारी गाँव के भीड़  बढ़ाने  वाले लोग होते हैं। 
ये ट्रैक्टर , बसें , आदि भरकर कार्यक्रम स्थल पर पहुँचते हैं। यही इनकी कार्य सिद्धि है।

   इससे से स्प्ष्ट है कि लोधी समाज संतरे की फाँकों की तरह अनेक वर्गों में विभाजित है।जैसे संतरा ऊपर छिलके की तरफ से एक दिखता है, किन्तु अंदर पूर्ण विभाजन है। हर फांक अलग- अलग ही है। दिखावा ये किया जाता है कि सभी एक हैं , पर वास्तविकता तो संतरे को इन कार्यक्रमों में  खुलने पर ही ज्ञात होती है।इन कार्यक्रमों में शिक्षकों को कोई महत्व नहीं दिया जाता ।वहाँ प्राइमरी , जूनियर ,इंटर, डिग्री कालेज आदि सभी को केवल मास्साब  का सम्मान देकर टेंट के बाहर खड़ा कर दिया जाता है, चाहे वह 70 वर्ष का वरिष्ठ नागरिक ही क्यों न हों। समाज के सर्व प्रतिश्ठित शिक्षक का अवमूल्यन ,अपमान औऱ अप्रतिष्ठा अगर कहीं देखनी हो, तो बड़े -बड़े लोधी सम्मेलनों में जाइए। वहाँ केवल चमचे औऱ चापलूसी करने वाले लोधियो को ही मालाओं  से सुसज्जित किया जाता है। बस आपके अंदर तेल मालिश और मक्खन लगाने की कला आनी चाहिए।
            इस प्रकार लोधी जाति:एक समीक्षा  का यह प्रकरण  "जाति वर्गीकरण"समाप्त हुआ।

💐शुभमस्तु!
✍🏼©लेखक: डॉ.भगवत स्वरूप राजपूत "शुभम"

बुधवार, 13 जून 2018

लोधी जाति :एक समीक्षा :परिचय(प्रकरण एक)

     देश के  लोधी  समाज के दसियों छोटे -बड़े कार्क्रम और सम्मेलन  और महासम्मेलनों में प्रतिभागिता  लेने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि लोधी समाज को अभी सवर्ण जातियों और कुछ पिछड़ी जातियों के समकक्ष आने में सैकड़ों वर्ष लगेंगे। केवल अपने मन को झूठी दिलासा देने से  काम नहीं चलेगा। अभी हम उसी झूठी दिलासा में खुश होकर जी रहे हैं।
        सम्मेलनों में बसें और कारें जुटाकर भीड़ बढ़ाने से विकास नहीं हो जाता। जिस समाज के लोगों को अभी तक सही ढंग से खाना खाने और पाखाना जाने का सहूर नहीं , उनसे कैसे अपेक्षा की जा सकती हैं कज़ वे प्रतिवर्ष सैकड़ों की संख्या में आई ए एस और आई एफ इस होकर स्वजाति के गौरव बनेंगे। हाँ, स्थिति आंशिक संतोष प्रद है। इससे ज्यादा खुश नहीं हुआ जा सकता।
       किसी  व्यक्ति , वंश , जाति आदि की संस्कृति , सभ्यता और संस्कार बदलने में सदियाँ लग जाती हैं। यह सहज सम्भव नहीं है। जो जाति प्राचीन काल से केवल लड़ने , मरने, मारने कृषि कर उसी में मस्त रहने में संतोष
कर जीती आई है , उसके संस्कार क्या  दो चार साल में बदले जा सकते हैं। कदापि नहीं ।
       लोग मंच पर चढ़कर बड़ी बड़ी बातें करते  देखे  जाते हैं ,किन्तु उनके अपने परिवार , घर या गाँव में किसी बुजुर्ग की मृत्यु होती है तो वहाँ तेरहवीं भी होती है। परम्परा के नाम पर सारी प्रगतिवादिता पानी भरने चली जाती है। रूढ़ियों में दम तोड़ रहा लोधी समाज परम्परा कद नाम पर न जाने कितने कुसंस्कारों में जकड़ा पड़ा है। आदमी को भालू ने नहीं पकड़ा , वरन आदमी ने ही अपने को भालू से जकड़ लिया है। यही  दशा लोधी समाज
की है।
       दूसरे की कूड़ भर जमीन जोत लेने पर  लोधी अपने को बहुत बुद्धिमान औऱ होशियर समझता है। इसी को  लेकर वह आए दिन कोर्ट में खड़ा रहता है। उसे वक़्त की किमत  गईं मालूम।बित्ते भर जमीन के टुकड़े  की खातिर वहः सारा जीवन कचहरी में  अपने कचों का हरण तो करता ही है , साथ ही वह अपनी अगली पीढयों को
बरबाद होने की विरासत भी देकर मर जाता है। इससे अगली पीढियां भी  मुक़दमें लड़ लड़ कर मर जाती हैं।। मुकदमेबाजी उसका  संस्कार   बन जाती है।फिर पढ़ने लिखने और आज की नई दुनिया की नई  रौशनी देखने
की उसे  फुर्सत ही कहाँ? बस वह इतने में ही मर खप कर जीवन की  इतिश्री कर लेता है।     
          एक एक आदमी जमीन पर बैठा बीस बीस पूड़ियों का ढेर लगाए । खाए या न खा पाए, पर उसके संतोष की सीमा का अतिक्रमण यहीं हो जाता है कि उसे सब्र नहीं कि बाद में उसे पूड़ियाँ मिलेंगी भी नहीं? जिस आदमी में इतना सब्र  नहीं , उससे समाज के लिए  कुछ  भी करने की  आशा भी कहाँ शेष रह जाती है। ऐसे एक नहीं अनेक दृश्य मैने अपनी आँखों से स्वयं देखे समझे हैं।मैं लोधी समाज पर शोध कर रहा हूँ। क्षेत्रों में भी घूमा हूँ।
देखा है कि लोग  दावत में निमंत्रण देकर अतिथियों से पत्तल डलवाते हैं। बुफे सिस्टम में नहीं, पत्तल पर   मेज कुर्सी पर खिलाएंगे और बाद में इशारा होगा कि उसे खुद डालें, घर न हो गया  किसी स्वयमसेवक संघ का शिविर हो  गया!  पूछने पर सब कुछ अपनी परंपरा को समर्पित कर दिया जाता है।  वाह!री परम्परा औऱ वाह!रे आधुनिक लोधी समाज? और फिर ठाकुर, बामन , बनियों से  होड़ लेना  चाहते हैं। मृत्यु भोज का विरोध केवल मंच पर,भाषणों की भषड़ में ही है , बाकी  गांव में खाते भी हैं और खाते भी हैं।  ये कैसा विरिधाभास! ये कैसा
प्रगतिवाद। क्या इसी के बल बूते पर लोधी कलक्टर और एस पी होना चाहता  है?  मंत्री और उच्च पद हासिल करना चाहता है।  विधायक और सांसद तो केवल वोट बैंक  के  बल पर हुआ जा सकता है। लेकिन आई ए एस, आई पी एस बनने के लिए दिमाग चाहिए, पढ़ाई चाहिए, 18 -20 घंटे पढ़ पाने का माद्दा  भी। कभी -कभी बड़ी कोफ्त होती है , लोधी समाज की दशा  देखकर।  नेताओं की तरह भीड़ जुटाकर रैली कर लेने का नाम प्रगति नहीं है।  अब तो हाल ये है कि आगे वाला आगे जा रहा है और पीछे वाला पीछे ही छूट रहा है।
       पढ़े लिखों की हालत ये है कि वह सोचता है कि ये मुझसे आगे न हो जाए.। इसलिए जानबूझ कर अपने समकक्ष योग्यों को उपेक्षित किया जा रहा है। कवि कवि को आगे  नहीं बढ़ने देना चाहता।  बुद्धिजीवी अगले बुद्धिजीवी को टंगड़ी मार कर गड्ढे में गिरा देने की फिराक में है। ईर्ष्या औऱ द्वेष इस कदर हावी है कि एक लोधि
दूसरे को आगे बढ़ते देखना नहीं चाहता। क्या ऐसे ही होगा लोधी समाज के विकास। गुटबाजी  और सियासत इस
कदर हावी हैं  कि आदमी की पहचान ही खो गई हैं। उच्च शिक्षित  अधिकारियों औऱ प्रबुद्ध जनों को छोड़कर  केवल पहचान और स्थानीयता के नाम पर अपमानित किया जाता है। ऐसा ही एक महासम्मेलन में देखने को मिला। व्यवस्थपकों के लिए किसी व्यक्ति का कोई महत्व नहीं है। सब धान 22 पंसेरी है।  सादर बुलाते हैं,  निरादर कर   भेजते हैं। व्यक्ति के पद औऱ स्तर के अनुसार खाने ठहरने की कोई समुचित व्यवस्था नहीं   । हाँ , केवल नेताओं और अधिकारियों को सिर आँखों पर बिठाते हुए स्टर्ड होटलों में ठहराया जाता है।  स्पेशल व्यवस्थाएं मुहैया कराई जाती है । दिखाना कुछ ऑर और करना  कुछ और। यही वास्तविकता है।
       जुआ, शराब , बाल विवाह, मृत्यु भोज, दहेज ,मुकदमेबाजी, सत्ता, अशिक्षा, परस्पर ईर्ष्या,  द्वेष आदि ऐसी अनगिनत बुराइयां लोधि समाज में तालाब में   जलकुंभी  किब तरह आच्छादित हैं , कि इनसे मुक्त होने में सदियाँ लग  लग जाएंगी   फिर  ही लोधी समाज को सुधरने में  संदेह रहेगा।
       यह समस्त विश्लेषण कल्पना पर आधारित  नहीं है। मेरे अपने भोगे हुए  65 वर्षों के  अध्ययन का निष्कर्ष है।केवल दोषारोपण मेरा लक्ष्य नहीं है, बात गंभीरता पूर्वक विचार करने की है। तभी कोई नए पथ का मार्ग प्रशस्त होगा,  बातों के बतासे खाने से कम नहीं  चलेगा।\

💐शुभमस्तु!

✍🏼लेखक ©डॉ. भगवत स्वरूप राजपूत "शुभम"

लोधीजाति:एक समीक्षा - लोधी समाज और राजनीति (प्रकरण सात)

   समाज से राजनीति है, राजनीति से समाज नहीं। समाज से ही राजनीति का अस्तित्व है, राजनीति से समाज का अस्तित्व नहीं है। इसलिए लोधी समाज के जो ...