देश के लोधी समाज के दसियों छोटे -बड़े कार्क्रम और सम्मेलन और महासम्मेलनों में प्रतिभागिता लेने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि लोधी समाज को अभी सवर्ण जातियों और कुछ पिछड़ी जातियों के समकक्ष आने में सैकड़ों वर्ष लगेंगे। केवल अपने मन को झूठी दिलासा देने से काम नहीं चलेगा। अभी हम उसी झूठी दिलासा में खुश होकर जी रहे हैं।
सम्मेलनों में बसें और कारें जुटाकर भीड़ बढ़ाने से विकास नहीं हो जाता। जिस समाज के लोगों को अभी तक सही ढंग से खाना खाने और पाखाना जाने का सहूर नहीं , उनसे कैसे अपेक्षा की जा सकती हैं कज़ वे प्रतिवर्ष सैकड़ों की संख्या में आई ए एस और आई एफ इस होकर स्वजाति के गौरव बनेंगे। हाँ, स्थिति आंशिक संतोष प्रद है। इससे ज्यादा खुश नहीं हुआ जा सकता।
किसी व्यक्ति , वंश , जाति आदि की संस्कृति , सभ्यता और संस्कार बदलने में सदियाँ लग जाती हैं। यह सहज सम्भव नहीं है। जो जाति प्राचीन काल से केवल लड़ने , मरने, मारने कृषि कर उसी में मस्त रहने में संतोष
कर जीती आई है , उसके संस्कार क्या दो चार साल में बदले जा सकते हैं। कदापि नहीं ।
लोग मंच पर चढ़कर बड़ी बड़ी बातें करते देखे जाते हैं ,किन्तु उनके अपने परिवार , घर या गाँव में किसी बुजुर्ग की मृत्यु होती है तो वहाँ तेरहवीं भी होती है। परम्परा के नाम पर सारी प्रगतिवादिता पानी भरने चली जाती है। रूढ़ियों में दम तोड़ रहा लोधी समाज परम्परा कद नाम पर न जाने कितने कुसंस्कारों में जकड़ा पड़ा है। आदमी को भालू ने नहीं पकड़ा , वरन आदमी ने ही अपने को भालू से जकड़ लिया है। यही दशा लोधी समाज
की है।
दूसरे की कूड़ भर जमीन जोत लेने पर लोधी अपने को बहुत बुद्धिमान औऱ होशियर समझता है। इसी को लेकर वह आए दिन कोर्ट में खड़ा रहता है। उसे वक़्त की किमत गईं मालूम।बित्ते भर जमीन के टुकड़े की खातिर वहः सारा जीवन कचहरी में अपने कचों का हरण तो करता ही है , साथ ही वह अपनी अगली पीढयों को
बरबाद होने की विरासत भी देकर मर जाता है। इससे अगली पीढियां भी मुक़दमें लड़ लड़ कर मर जाती हैं।। मुकदमेबाजी उसका संस्कार बन जाती है।फिर पढ़ने लिखने और आज की नई दुनिया की नई रौशनी देखने
की उसे फुर्सत ही कहाँ? बस वह इतने में ही मर खप कर जीवन की इतिश्री कर लेता है।
एक एक आदमी जमीन पर बैठा बीस बीस पूड़ियों का ढेर लगाए । खाए या न खा पाए, पर उसके संतोष की सीमा का अतिक्रमण यहीं हो जाता है कि उसे सब्र नहीं कि बाद में उसे पूड़ियाँ मिलेंगी भी नहीं? जिस आदमी में इतना सब्र नहीं , उससे समाज के लिए कुछ भी करने की आशा भी कहाँ शेष रह जाती है। ऐसे एक नहीं अनेक दृश्य मैने अपनी आँखों से स्वयं देखे समझे हैं।मैं लोधी समाज पर शोध कर रहा हूँ। क्षेत्रों में भी घूमा हूँ।
देखा है कि लोग दावत में निमंत्रण देकर अतिथियों से पत्तल डलवाते हैं। बुफे सिस्टम में नहीं, पत्तल पर मेज कुर्सी पर खिलाएंगे और बाद में इशारा होगा कि उसे खुद डालें, घर न हो गया किसी स्वयमसेवक संघ का शिविर हो गया! पूछने पर सब कुछ अपनी परंपरा को समर्पित कर दिया जाता है। वाह!री परम्परा औऱ वाह!रे आधुनिक लोधी समाज? और फिर ठाकुर, बामन , बनियों से होड़ लेना चाहते हैं। मृत्यु भोज का विरोध केवल मंच पर,भाषणों की भषड़ में ही है , बाकी गांव में खाते भी हैं और खाते भी हैं। ये कैसा विरिधाभास! ये कैसा
प्रगतिवाद। क्या इसी के बल बूते पर लोधी कलक्टर और एस पी होना चाहता है? मंत्री और उच्च पद हासिल करना चाहता है। विधायक और सांसद तो केवल वोट बैंक के बल पर हुआ जा सकता है। लेकिन आई ए एस, आई पी एस बनने के लिए दिमाग चाहिए, पढ़ाई चाहिए, 18 -20 घंटे पढ़ पाने का माद्दा भी। कभी -कभी बड़ी कोफ्त होती है , लोधी समाज की दशा देखकर। नेताओं की तरह भीड़ जुटाकर रैली कर लेने का नाम प्रगति नहीं है। अब तो हाल ये है कि आगे वाला आगे जा रहा है और पीछे वाला पीछे ही छूट रहा है।
पढ़े लिखों की हालत ये है कि वह सोचता है कि ये मुझसे आगे न हो जाए.। इसलिए जानबूझ कर अपने समकक्ष योग्यों को उपेक्षित किया जा रहा है। कवि कवि को आगे नहीं बढ़ने देना चाहता। बुद्धिजीवी अगले बुद्धिजीवी को टंगड़ी मार कर गड्ढे में गिरा देने की फिराक में है। ईर्ष्या औऱ द्वेष इस कदर हावी है कि एक लोधि
दूसरे को आगे बढ़ते देखना नहीं चाहता। क्या ऐसे ही होगा लोधी समाज के विकास। गुटबाजी और सियासत इस
कदर हावी हैं कि आदमी की पहचान ही खो गई हैं। उच्च शिक्षित अधिकारियों औऱ प्रबुद्ध जनों को छोड़कर केवल पहचान और स्थानीयता के नाम पर अपमानित किया जाता है। ऐसा ही एक महासम्मेलन में देखने को मिला। व्यवस्थपकों के लिए किसी व्यक्ति का कोई महत्व नहीं है। सब धान 22 पंसेरी है। सादर बुलाते हैं, निरादर कर भेजते हैं। व्यक्ति के पद औऱ स्तर के अनुसार खाने ठहरने की कोई समुचित व्यवस्था नहीं । हाँ , केवल नेताओं और अधिकारियों को सिर आँखों पर बिठाते हुए स्टर्ड होटलों में ठहराया जाता है। स्पेशल व्यवस्थाएं मुहैया कराई जाती है । दिखाना कुछ ऑर और करना कुछ और। यही वास्तविकता है।
जुआ, शराब , बाल विवाह, मृत्यु भोज, दहेज ,मुकदमेबाजी, सत्ता, अशिक्षा, परस्पर ईर्ष्या, द्वेष आदि ऐसी अनगिनत बुराइयां लोधि समाज में तालाब में जलकुंभी किब तरह आच्छादित हैं , कि इनसे मुक्त होने में सदियाँ लग लग जाएंगी फिर ही लोधी समाज को सुधरने में संदेह रहेगा।
यह समस्त विश्लेषण कल्पना पर आधारित नहीं है। मेरे अपने भोगे हुए 65 वर्षों के अध्ययन का निष्कर्ष है।केवल दोषारोपण मेरा लक्ष्य नहीं है, बात गंभीरता पूर्वक विचार करने की है। तभी कोई नए पथ का मार्ग प्रशस्त होगा, बातों के बतासे खाने से कम नहीं चलेगा।\
💐शुभमस्तु!
✍🏼लेखक ©डॉ. भगवत स्वरूप राजपूत "शुभम"
सम्मेलनों में बसें और कारें जुटाकर भीड़ बढ़ाने से विकास नहीं हो जाता। जिस समाज के लोगों को अभी तक सही ढंग से खाना खाने और पाखाना जाने का सहूर नहीं , उनसे कैसे अपेक्षा की जा सकती हैं कज़ वे प्रतिवर्ष सैकड़ों की संख्या में आई ए एस और आई एफ इस होकर स्वजाति के गौरव बनेंगे। हाँ, स्थिति आंशिक संतोष प्रद है। इससे ज्यादा खुश नहीं हुआ जा सकता।
किसी व्यक्ति , वंश , जाति आदि की संस्कृति , सभ्यता और संस्कार बदलने में सदियाँ लग जाती हैं। यह सहज सम्भव नहीं है। जो जाति प्राचीन काल से केवल लड़ने , मरने, मारने कृषि कर उसी में मस्त रहने में संतोष
कर जीती आई है , उसके संस्कार क्या दो चार साल में बदले जा सकते हैं। कदापि नहीं ।
लोग मंच पर चढ़कर बड़ी बड़ी बातें करते देखे जाते हैं ,किन्तु उनके अपने परिवार , घर या गाँव में किसी बुजुर्ग की मृत्यु होती है तो वहाँ तेरहवीं भी होती है। परम्परा के नाम पर सारी प्रगतिवादिता पानी भरने चली जाती है। रूढ़ियों में दम तोड़ रहा लोधी समाज परम्परा कद नाम पर न जाने कितने कुसंस्कारों में जकड़ा पड़ा है। आदमी को भालू ने नहीं पकड़ा , वरन आदमी ने ही अपने को भालू से जकड़ लिया है। यही दशा लोधी समाज
की है।
दूसरे की कूड़ भर जमीन जोत लेने पर लोधी अपने को बहुत बुद्धिमान औऱ होशियर समझता है। इसी को लेकर वह आए दिन कोर्ट में खड़ा रहता है। उसे वक़्त की किमत गईं मालूम।बित्ते भर जमीन के टुकड़े की खातिर वहः सारा जीवन कचहरी में अपने कचों का हरण तो करता ही है , साथ ही वह अपनी अगली पीढयों को
बरबाद होने की विरासत भी देकर मर जाता है। इससे अगली पीढियां भी मुक़दमें लड़ लड़ कर मर जाती हैं।। मुकदमेबाजी उसका संस्कार बन जाती है।फिर पढ़ने लिखने और आज की नई दुनिया की नई रौशनी देखने
की उसे फुर्सत ही कहाँ? बस वह इतने में ही मर खप कर जीवन की इतिश्री कर लेता है।
एक एक आदमी जमीन पर बैठा बीस बीस पूड़ियों का ढेर लगाए । खाए या न खा पाए, पर उसके संतोष की सीमा का अतिक्रमण यहीं हो जाता है कि उसे सब्र नहीं कि बाद में उसे पूड़ियाँ मिलेंगी भी नहीं? जिस आदमी में इतना सब्र नहीं , उससे समाज के लिए कुछ भी करने की आशा भी कहाँ शेष रह जाती है। ऐसे एक नहीं अनेक दृश्य मैने अपनी आँखों से स्वयं देखे समझे हैं।मैं लोधी समाज पर शोध कर रहा हूँ। क्षेत्रों में भी घूमा हूँ।
देखा है कि लोग दावत में निमंत्रण देकर अतिथियों से पत्तल डलवाते हैं। बुफे सिस्टम में नहीं, पत्तल पर मेज कुर्सी पर खिलाएंगे और बाद में इशारा होगा कि उसे खुद डालें, घर न हो गया किसी स्वयमसेवक संघ का शिविर हो गया! पूछने पर सब कुछ अपनी परंपरा को समर्पित कर दिया जाता है। वाह!री परम्परा औऱ वाह!रे आधुनिक लोधी समाज? और फिर ठाकुर, बामन , बनियों से होड़ लेना चाहते हैं। मृत्यु भोज का विरोध केवल मंच पर,भाषणों की भषड़ में ही है , बाकी गांव में खाते भी हैं और खाते भी हैं। ये कैसा विरिधाभास! ये कैसा
प्रगतिवाद। क्या इसी के बल बूते पर लोधी कलक्टर और एस पी होना चाहता है? मंत्री और उच्च पद हासिल करना चाहता है। विधायक और सांसद तो केवल वोट बैंक के बल पर हुआ जा सकता है। लेकिन आई ए एस, आई पी एस बनने के लिए दिमाग चाहिए, पढ़ाई चाहिए, 18 -20 घंटे पढ़ पाने का माद्दा भी। कभी -कभी बड़ी कोफ्त होती है , लोधी समाज की दशा देखकर। नेताओं की तरह भीड़ जुटाकर रैली कर लेने का नाम प्रगति नहीं है। अब तो हाल ये है कि आगे वाला आगे जा रहा है और पीछे वाला पीछे ही छूट रहा है।
पढ़े लिखों की हालत ये है कि वह सोचता है कि ये मुझसे आगे न हो जाए.। इसलिए जानबूझ कर अपने समकक्ष योग्यों को उपेक्षित किया जा रहा है। कवि कवि को आगे नहीं बढ़ने देना चाहता। बुद्धिजीवी अगले बुद्धिजीवी को टंगड़ी मार कर गड्ढे में गिरा देने की फिराक में है। ईर्ष्या औऱ द्वेष इस कदर हावी है कि एक लोधि
दूसरे को आगे बढ़ते देखना नहीं चाहता। क्या ऐसे ही होगा लोधी समाज के विकास। गुटबाजी और सियासत इस
कदर हावी हैं कि आदमी की पहचान ही खो गई हैं। उच्च शिक्षित अधिकारियों औऱ प्रबुद्ध जनों को छोड़कर केवल पहचान और स्थानीयता के नाम पर अपमानित किया जाता है। ऐसा ही एक महासम्मेलन में देखने को मिला। व्यवस्थपकों के लिए किसी व्यक्ति का कोई महत्व नहीं है। सब धान 22 पंसेरी है। सादर बुलाते हैं, निरादर कर भेजते हैं। व्यक्ति के पद औऱ स्तर के अनुसार खाने ठहरने की कोई समुचित व्यवस्था नहीं । हाँ , केवल नेताओं और अधिकारियों को सिर आँखों पर बिठाते हुए स्टर्ड होटलों में ठहराया जाता है। स्पेशल व्यवस्थाएं मुहैया कराई जाती है । दिखाना कुछ ऑर और करना कुछ और। यही वास्तविकता है।
जुआ, शराब , बाल विवाह, मृत्यु भोज, दहेज ,मुकदमेबाजी, सत्ता, अशिक्षा, परस्पर ईर्ष्या, द्वेष आदि ऐसी अनगिनत बुराइयां लोधि समाज में तालाब में जलकुंभी किब तरह आच्छादित हैं , कि इनसे मुक्त होने में सदियाँ लग लग जाएंगी फिर ही लोधी समाज को सुधरने में संदेह रहेगा।
यह समस्त विश्लेषण कल्पना पर आधारित नहीं है। मेरे अपने भोगे हुए 65 वर्षों के अध्ययन का निष्कर्ष है।केवल दोषारोपण मेरा लक्ष्य नहीं है, बात गंभीरता पूर्वक विचार करने की है। तभी कोई नए पथ का मार्ग प्रशस्त होगा, बातों के बतासे खाने से कम नहीं चलेगा।\
💐शुभमस्तु!
✍🏼लेखक ©डॉ. भगवत स्वरूप राजपूत "शुभम"
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