शुक्रवार, 22 जून 2018

लोधी जाति :एक समीक्षा - सर्वोपरि शैक्षिक जागरण (प्रकरण छः)

शिक्षा मानव जीवन के विकास के लिए संजीवनी है। जिसने भी शिक्षा के महत्त्व को समझा है, सदैव से समाज में वही अग्रणी रहा है, है, और रहेगा।जिन जातियों को समाज में आज सर्वश्रेष्ठ का दर्जा प्राप्त है , वे सभी जातियाँ शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी हैं। जिन जातियों और समाजों को आज राजनीतिक रूप से पिछड़ा अथवा दलित माना जाता है, वह यों ही नहीं है।सदैव से वही आगे रहा है , जिसने अच्छी शिक्षा प्राप्त की। सवर्ण कही जाने वाली ब्राह्मण जाति ने तो अपना पेशा ही अध्य्यन करना और कराना बनाया । जो युग -युग से आज भी जारी है। इसी प्रकार अन्य क्षत्रिय, वैश्य या दलित वर्ग ने शिक्षा के महत्व को समझा ,वे किसी की मुँहताज नहीं हैं। माना कि युग के अनुरूप क्षत्रिय जातियों का कर्तव्य युद्ध करना और रक्षा करना माना गया ,लेकिन जब युग बदलता है तो हमारी उन सारी प्रवृत्तियों में भी परिवर्तन आजाना चाहिए। प्राचीन काल के वातावरण और आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उस समय राष्ट्र रक्षा औऱ आत्मरक्षा हेतु क्षत्रियों के लिए युद्ध आवश्यक रहे होंगे, किन्तु क्या आज के परिवेश में भी वही सब करना चाहिए ?इसी संस्कार के अहंकारवश यदि लोधी समाज आगे बढ़ना चाहता है तो ये उसकी सबसे बड़ी भूल होगी।परिणाम ये देखने को मिल रहे हैं कि वे आपस में लड़ भिड़ कर क्षरित हो रहे हैं।कोई किसी की मेड जोतकर अपनी होशियारी दिखा रहा है तो कोई-कोई एक एक बालिश्त जमीन के लिए जीवन की सारी जमा पूँजी कचहरी में बरवाद कर रहा है।छोटी-छोटी बातों पर परस्पर लड़ाइयां करके कमजोर हो रहे हैं।
जिस पैसे को बच्चों की शिक्षा पर व्यय करके उनका जीवन सुधार सकते थे,वह कोर्ट कचहरी में वकीलों पर बरवाद कर रहे हैं।अपने अहंकार में लड़ना -भिड़ना ही उनके जीवन का उद्देश्य बन कर रह गया है। यदि सर्वेक्षण कराया जाए तो देश की अदालतों में जितने भी मुकदमे चल रहे हैं, उनमें सबसे अधिक संख्या लोधी समाज सहित अन्य पिछड़ी जातियों की ही मिलेगी। यह कहने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है कि इस स्तर पर यदि सबसे निम्न स्तर पर यदि कोई है तो वह लोधी ही है।कोरी हेकड़ी और ऐंठ से भरा हुआ लोधी इन सब बातों को सुनने और समझने के लिए भी तैयार नहीं है।
माना कि थोड़ा - बहुत असर लोधी समाज पर पड़ा भी है , तो उसमें भी उसकी वरीयता अपने पैतृक पेशे कृषि पर ही है। इसलिए वह जिन विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाता है, वे गिरे हुए स्तर के विद्यालय हैं। निजी विद्यालय शिक्षा के नाम पर कोढ़ हैं, जिनमें न तो पढ़ाई होती है और न ही कोई पढ़ाता है, क्योंकि विद्यालय या महाविद्यालय मालिकों को केवल और केवल फीस चहिए।बच्चे के व्यक्तित्व विकास, शिक्षा और चारित्रिक विकास से कोई मतलब नहीं है।न वहाँ शिक्षक हैं ,और न विद्यार्थी।यदि शिक्षक हैं भी तो सर्वथा अयोग्य, पढ़ाने हेतु अपात्र औऱ वे लोग हैं ,जो बेरोजगार होने के कारण अपने बीबी -बच्चों को दो वक्त की रोटी देने के लिए अपने दिन गुजार कर समय पास कर रहे हैं।जब स्कूल कालेज में पढ़ाई नहीं होगी तो स्वाभाविक है बच्चे की योग्यता शून्य होगी।
इस कमी को पूरा करने के लिए उन्हीं अपात्रों द्वारा आधी अधूरी नकल कराके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है।जिन डिग्री कक्षाओं के बच्चों को अपने विषय (ज्योग्राफी, बॉटनी, फिजिक्स) आदि की सही स्पेलिंग भी नहीं।आती हो, उनसे क्या आप कुछ अपेक्षा कर सकते हैं। यह स्थिति प्रयोगात्मक मौखिक परीक्षा की है। ये सभी बातें काल्पनिक नहीं हैं, लेखक ने अपनी आँखों के सामने यही नज़ारा देखा औऱ समझा है। यद्यपि प्रदेश में बेसिक स्तर से ही शिक्षा की यही दुर्व्यवस्था है,औऱ दशमोत्तर तथा उच्च शिक्षा में बहुत बुरा हाल है।इस सबका दुष्परिणाम यदि भोग रही हैं ,तो वे सभी लोधी समाज जैसी पिछड़ी औऱ दलित जातियाँ हैं।लोधी समाज के लोग ऐसी ही संस्थाओं में बच्चों को भेजकर उनके पैरों में खुद कुल्हाड़ा मार रहे हैं।इतनी आज़ादी और बरबादी के मौके भला अच्छे शिक्षा संस्थानों में कैसे मिल सकते हैं? इनमें पढ़ता हुआ लोधी बच्चा घर पर बाप के आदेश पर पहले खेत में धान की रोपाई करवाता है, आलू गढ़वाता है, आलू ईख में पानी लगवाता है, और पढ़ाई को छोड़कर घर के सारे काम करवाता है।ऐसी आज़ादी भला और कहाँ? माँ -बाप कभी ये नहीं कहते कि कभी पढ़ भी लिया कर। जिस समाज के लोगों का शिक्षा के प्रति ये रवैया हो, वह समाज भला आगे कैसे बढ़ सकता है! ऐसा है वर्तमान लोधी समाज। माना कि किसान अन्नदाता है, लेकिन देश में सर्वाधिक शोषण भी उसीका हो रहा है।अन्न, सब्जी ,फल आदि का उत्पादन भी जरूरी है।किन्तु घर , परिवार और बच्चों के भविष्य को दाँव पर लगाकर तो ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। जो जातियाँ आज तक सिर्फ खेती किसानी के बल पर जीती रहीं, वे सभी आज पिछड़ी हुई हैं। लेकिन तथाकथित सभी सवर्ण जातियाँ कृषि को छोड़कर या गौण मानकर चलीं , वे प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी हैं।लोधी समाज को उन सबसे प्रेरणा लेनी होगी, और अपनी नाव को विकास की गंगा में उतारने से पहले शिक्षा की पतवार को मजबूती के साथ ग्रहण कर पार उतरना होगा सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आए ,तो उसे भूला हुआ नहीं कहते।

शुभमस्तु!
लेखक © डॉ.भगवत स्वरूप राजपूत "शुभम"
22.06.2018 ●9.15 पूर्वान्ह।

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