समाज से राजनीति है, राजनीति से समाज नहीं। समाज से ही राजनीति का अस्तित्व है, राजनीति से समाज का अस्तित्व नहीं है। इसलिए लोधी समाज के जो लोग राजनीति की चकाचौंध से प्रभावित हैं , जिनकी आँखें राजनीति काली छाया को रौशनी समझ रही है ,वे अच्छी तरह से जान लें कि राजनीति भगवान नहीं है। उनकी नज़र में राजनेता और राजनीति भगवान है, वे अज्ञानी हैं, अनाड़ी हैं, अपरिपक्व हैं, और अन्य सभी प्रकार की समस्त योग्यताओं से विहीन हैं। जैसा कि ओशो ने एक स्थान पर सटीक मन्तव्य दिया है: ' राजनीति उनके लिए है , जिनके लिए कुछ और नहीं। जो मूर्ति नहीं बना सकते, जो चित्र नहीं रंग सकते, जो गीत नहीं गा सकते, जो कुछ भी नहीं कर सकते - उन सब अयोग्यों के लिए राजनीति है।आखिर अयोग्यों के लिए भी तो कुछ होना चाहिए जिनमें और कोई योग्यता नहीं है, उनमें राजनीति की योग्यता होती है।राजनीति के लिए बुद्धि नहीं चाहिए। क्योंकि बुद्धिमान आदमी इतनी बेईमानी नहीं कर सकता; कुछ तो सोचेगा बुद्धिमान आदमी इतने धोखे नहीं दे सकता। कुछ तो विचारेगा बुद्धिमान आदमी, इतने झूठ नहीं बोल सकता।आखिर खुद की आत्मा कचोटेगी! और राज-नीति तो सिर्फ झूठे आश्वासन हैं। सिर्फ़ झूठ पर झूठ। अत्यंत सोई हुई चेतना चहिए राजनीति में सफ़ल होने के लिए।'
इससे स्पष्ट है कि राजनीति में सफ़ल होने के लिए आदमी को धोखेबाज, चार सौ बीस, झूठा, छल - फरेबी, अपराधी वृत्ति का व्यक्ति होना चाहिए। सत्यवादी, भले, छल-कपट से दूर ईमानदार आदमी का यहाँ कोई काम नहीं है। लोधी- समाज राजनीतिक दृष्टि से इसीलिए पिछड़ा हुआ है क्योंकि उसके जातीय गुणों में झूठ, छल कपट ,आदि नहीं है। जैसे जैसे इन तत्वों का समावेश वहाँ हो रहा है, वैसे वैसे राजनीतिक चेतना आ रही है, लेकिन उस राजनीतिक चेतना का लोधी जाति को विशेष लाभ नहीं हो रहा है। प्रत्यक्ष रूप से देखा जाए तो बिना किसी लोधी राजनेता का नाम लिए हुए कहूँगा कि जितने भी राजनेता मुख्य मंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक आदि हुए हैं, उनमें से आज तक कितनों ने समाज के लोगों का भला किया। सिवाय इसके कि उन्होंने भी अन्य जातियों की तरह अपने परिवार और अपनी तिजोरियों पर ही विकास का सारा दूध उँडेल दिया। बहुत अधिक अपने सम्बसन्धियों को भी कृतज्ञ किया । यदि उनके पास जाति के नाम पर कोई आदमी ट्रांसफर, नियुक्ति और किसी अन्य छोटे मोटे कार्य के लिए गया तो उसेअपमान ,उपेक्षा, अपनेपन का सर्वथा अभाव, पारदर्शिता की दुहाई , ईमानदारी का छोंक, और कार्य में शत प्रतिशत असफलता ही हाथ लगी। उस स्वजातीय व्यक्ति को एक मिनट देना भी भारी पड़ा नेताजी को। और हम लोधी जाति के लोग इतने अंधे और मूर्ख हैं कि गर्व से छाती फुलाए हुए पार्टी के झंडे को गले से लगाए हुए इतने गौरवान्वित महसूस करते हैं कि जैसे हमीं मुख्यमंत्री हों, मंत्री हों, विधायक हों और उधर दूसरा ही खेल हो रहा है , जहाँ बनियां, बामनों को गले लगाया जा रहा है। उनके सार काम किए जा रहे हैं, वहाँ सारा आदर्शवाद कहाँ चला जा रहा है! केवल स्वजातीय लोगों को आदर्श का आईना दिखाया जा रहा है। यह सब भोगा हुआ सच है, कोई काल्पनिक कहानी नहीं है।ऐसी राजनीति की कीचड़ में केवल उसी प्रकार के लोगों का अस्तित्व सम्भव है। दो वक्त की मेहनत की रोटी खाने वाले लोधी जाति के व्यक्ति को राजनीति में अंधाधुंध पैसा खर्च करने के लिए धन कहाँ है? ईमानदारी से केवल दो वक्त की रोटी खाई जा सकती है, चुनाव नहीं लड़ा जा सकता। पर धन और पराई सम्पत्ति को छीनकर ही धनी हुआ जा सकता है। इस प्रकार राजनीति में ईमानदारी के लिए स्थान कहाँ? युग के अनुसार समय के साथ चलने के लिए राजनीतिक जागरूकता आवश्यक है। किंतु अपने चरित्र, स्वाभिमान, सत्य, ईमानदारी को दांव पर लगाकर राजनीति करने का कोई औचित्य नहीं है।
शुभमस्तु!
लेखक © डॉ. भगवत स्वरूप"शुभम"
27.06.2018●7.15PM
इससे स्पष्ट है कि राजनीति में सफ़ल होने के लिए आदमी को धोखेबाज, चार सौ बीस, झूठा, छल - फरेबी, अपराधी वृत्ति का व्यक्ति होना चाहिए। सत्यवादी, भले, छल-कपट से दूर ईमानदार आदमी का यहाँ कोई काम नहीं है। लोधी- समाज राजनीतिक दृष्टि से इसीलिए पिछड़ा हुआ है क्योंकि उसके जातीय गुणों में झूठ, छल कपट ,आदि नहीं है। जैसे जैसे इन तत्वों का समावेश वहाँ हो रहा है, वैसे वैसे राजनीतिक चेतना आ रही है, लेकिन उस राजनीतिक चेतना का लोधी जाति को विशेष लाभ नहीं हो रहा है। प्रत्यक्ष रूप से देखा जाए तो बिना किसी लोधी राजनेता का नाम लिए हुए कहूँगा कि जितने भी राजनेता मुख्य मंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक आदि हुए हैं, उनमें से आज तक कितनों ने समाज के लोगों का भला किया। सिवाय इसके कि उन्होंने भी अन्य जातियों की तरह अपने परिवार और अपनी तिजोरियों पर ही विकास का सारा दूध उँडेल दिया। बहुत अधिक अपने सम्बसन्धियों को भी कृतज्ञ किया । यदि उनके पास जाति के नाम पर कोई आदमी ट्रांसफर, नियुक्ति और किसी अन्य छोटे मोटे कार्य के लिए गया तो उसेअपमान ,उपेक्षा, अपनेपन का सर्वथा अभाव, पारदर्शिता की दुहाई , ईमानदारी का छोंक, और कार्य में शत प्रतिशत असफलता ही हाथ लगी। उस स्वजातीय व्यक्ति को एक मिनट देना भी भारी पड़ा नेताजी को। और हम लोधी जाति के लोग इतने अंधे और मूर्ख हैं कि गर्व से छाती फुलाए हुए पार्टी के झंडे को गले से लगाए हुए इतने गौरवान्वित महसूस करते हैं कि जैसे हमीं मुख्यमंत्री हों, मंत्री हों, विधायक हों और उधर दूसरा ही खेल हो रहा है , जहाँ बनियां, बामनों को गले लगाया जा रहा है। उनके सार काम किए जा रहे हैं, वहाँ सारा आदर्शवाद कहाँ चला जा रहा है! केवल स्वजातीय लोगों को आदर्श का आईना दिखाया जा रहा है। यह सब भोगा हुआ सच है, कोई काल्पनिक कहानी नहीं है।ऐसी राजनीति की कीचड़ में केवल उसी प्रकार के लोगों का अस्तित्व सम्भव है। दो वक्त की मेहनत की रोटी खाने वाले लोधी जाति के व्यक्ति को राजनीति में अंधाधुंध पैसा खर्च करने के लिए धन कहाँ है? ईमानदारी से केवल दो वक्त की रोटी खाई जा सकती है, चुनाव नहीं लड़ा जा सकता। पर धन और पराई सम्पत्ति को छीनकर ही धनी हुआ जा सकता है। इस प्रकार राजनीति में ईमानदारी के लिए स्थान कहाँ? युग के अनुसार समय के साथ चलने के लिए राजनीतिक जागरूकता आवश्यक है। किंतु अपने चरित्र, स्वाभिमान, सत्य, ईमानदारी को दांव पर लगाकर राजनीति करने का कोई औचित्य नहीं है।
शुभमस्तु!
लेखक © डॉ. भगवत स्वरूप"शुभम"
27.06.2018●7.15PM
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