बुधवार, 20 जून 2018

लोधी जाति :एक समीक्षा - प्रकृति और विकृति (प्रकरण पांच)

   इस बात से सभी भिज्ञ हैं कि लोधी एक पिछड़ी जाति है।अहंकारवश कोरा दम्भ भरने से वह अग्रणी नहीं हो जाएगी।इस जाति की प्रकृति ही सरलता से भरी हुई है। वह छल -कपट से दूर एक सीधी और सरल जाति है।इसी सिधाई और सरलपन के कारण उसका शोषण हुआ है और आज भी हो रहा है। जंगल का नियम है कि जंगल में पहले वे पेड़ ही काटे जाते  हैं, जो सीधे होते हैं।इस सीधेपन की अच्छाई ने आज तक उसका पतन ही किया है। सही शब्दों में यदि कहा जाए तो उसकी ये प्रकृति ही उसकी विकृति बन गई है।गुण अवगुण बन गया। युग की मांग के अनुरूप उसका ये गुण उसके शोषण और अप्रगतिशीलता का कारण बन गया है।सच्चाई , ईमानदारी, परिश्रमशीलता, लगन शीलता, विशुद्धता, कर्मठता आदि बहुमूल्य गुणों के बावजूद उसमे कुछ विकृतियां भी बुरी तरह से घर कर गई  हैं।इन विभिन्न विकृतियों की ओर यदि दृष्टिपत्व किया जाए तो निष्कर्ष यही  निकलता है कि उसके पिछड़ेपन के मूल में अनेक कारण हैं। जिन पर क्रमशः दृष्टिपात करना परमावश्यक है।
1. सगोत्र विवाह पद्धति।
2. शिक्षा की ओर ध्यान न देना।
3. सामिष तथा तामसी आहार का आधिक्य।
4. सुरापान।
5. दहेज का लेनदेन।
6 .मृत्यु भोज खाना औऱ खिलाना
7. परस्पर ईर्ष्या और वैमनस्य का भाव रखना।
8.सामाजिक एकता का अभाव।
9. किसी सामर्थ्यवान लोधी द्वारा किसी असहाय या गरीब की मदद नहीं करना।
10.अन्य समाजों में स्वजाति को छिपाना।
11.कछुआवृत्ति में जीवन -यापन करना।
12.जड़वादिता का समावेश।
13.प्रगतिशील सोच का अभाव।
14. रूढ़ियों को बंदरिया के मरे हुए बच्चे की तरह गले में लटकाए फिरना।
15. दहेज का लेना और देना।
16. कम आयु में ही बच्चों के विवाह कर देना।
17.संकीर्ण सोच की मानसिकता।
18.बुजुर्गों औऱ उच्च शिक्षित लोगों को सम्मान न देना।
19.अपने अहंकार में किसी को महत्व प्रदान न करना।
20.उच्च जातियों के पिछलग्गू बने रहकर उनकी चापलूसी में मगन रहना।
21. जुआ सट्टे में  धन  और परिवार  नष्ट होना।
   आदि आदि बहुत सी विकृतियां लोधी समाज में व्याप्त हैं।जिनके चलते उसके विकास में बाधा आ रही हैं।मैं पहले ही स्प्ष्ट कर चुका हूँ कि लोधी एक सीधी, सरल और भोली जाति है।और दूसरी ओर।वह भगवान भोलेश्वर की भक्त भी है।इसलिए इसका नाम।लोधी न होकर 'भोली होना चाहिए।उसके इसी गुण के चलते उसे अन्य समाज के लोगों द्वारा 'कबूतर जाति' की संज्ञा भी दी जाती है।जैसे कबूतर एक भोला और सरल पक्षी है,वैसे ही मानव जाति में लोधी जाति है। उसका शोषण कोई भी कर लेता है। जो उचित नहीं है।आज के युग में सीधे का मतलब मूर्ख ही होता है। इसलिए युग के साथ कदम से कदम मिला चलिए, अन्यथा प्रतियोगिता के इस युग में पीछे रह जाओगे।

💐शुभमस्तु!

✍🏼*लेखक ©:डॉ . भगवत स्वरूप  राजपूत " शुभम"

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