लोधी जाति का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। ये जाति
अपनी प्रारंभिक अवस्था से ही बहुत जुझारू, संघर्षप्रिय और कर्तव्य के प्रति निष्ठावान रही है।आर्थिक दृष्टि से विपन्न लोधी जाति अपने अस्तित्व और जीवनयापन के लिए जूझती रही है।उसका वही संस्कार उसमें आज भी विद्यमान है।जो काम उसको मिला अथवा किया,उसका निर्वाह उसने मनोयोगपूर्वक किया।किसी प्रकार की हीला - हवाली ,बहानेबाजी या देरी किए बिना समयान्तर्गत उस कार्य को पूरा किया।परिश्रमी और शारीरिक श्रम करने के कारण उसने धूप, पानी, ठंडी, गर्मी आदि की चिंता किए बिना अपना कार्य समय से पूरा किया,इसीलिए उसका रंग रूप साँवला हो गया।आज भी अधिकांशतः लोधी इसीलिए साँवले या और भी गहरे रंग के मिलते हैं। यह उसका कोई दोष नहीं ,अपितु जातीय गुणसूत्र गत विशुद्धता की पहचान है।अर्थात लोधी जाति में वर्णसंकरता का अभाव है। इसीलिए ऐसा प्रतीत होता है कि वहाँ स्वगोत्र विवाह पद्धति लागू हुई। लोधी जाति के पुरुषों ने अन्य जाति धर्मों में विवाह - सम्बन्ध न कर केवल अपने ही गोत्र में किए। यही उसके पिछड़े पन का बीजारोपण हुआ।जो आज के प्रगतिशील युग में एक चिंतनीय स्थिति का रूप ले चुका है। हम युग के अनुरूप बदल नहीं पाए। यही बीज पीढ़ी दर पीढ़ी पुष्ट होता हुआ आज की दशा को प्राप्त हुआ है।
कुछ आततायियों द्वारा लोधी जाति के लोगों को सताया भी गया। आज कुछ जातियाँ जिन्हें अपना भगवान मानती हैं , उन परशुराम और उन्हीं जैसे चालक लोगों के द्वारा उन्हें मारा- पीटा और सताया गया।उनका मनमाना शोषण भी किया गया। शोषित और पीड़ित होने के बाद उसने अपने अस्तित्व की रक्षा जिस किसी प्रकार की।सारा जीवन जब लड़ते -झगड़ते ही बीत जाए तो पढ़ना-लिखना कैसे हो सकता है। रात और दिन दाल रोटी की चिंता में जूझते रहना है तो पढ़ाई कब औऱ कैसे हो?और दूसरी ओर आदिकाल में भी शिक्षा ग्रहण कराने और पढ़ाने का काम केवल ब्राह्मणों के हाथ में था। जब एकलव्य को शिक्षा के अधिकार से वंचित किया जा सकता है तो लोधी व्यक्ति को भी कौन प्रेम पूर्वक शिक्षा दे सकता होगा? वही दुत्कार और उपेक्षा ही उसे मिली और मिलती आई।
कुछ आततायियों द्वारा लोधी जाति के लोगों को सताया भी गया। आज कुछ जातियाँ जिन्हें अपना भगवान मानती हैं , उन परशुराम और उन्हीं जैसे चालक लोगों के द्वारा उन्हें मारा- पीटा और सताया गया।उनका मनमाना शोषण भी किया गया। शोषित और पीड़ित होने के बाद उसने अपने अस्तित्व की रक्षा जिस किसी प्रकार की।सारा जीवन जब लड़ते -झगड़ते ही बीत जाए तो पढ़ना-लिखना कैसे हो सकता है। रात और दिन दाल रोटी की चिंता में जूझते रहना है तो पढ़ाई कब औऱ कैसे हो?और दूसरी ओर आदिकाल में भी शिक्षा ग्रहण कराने और पढ़ाने का काम केवल ब्राह्मणों के हाथ में था। जब एकलव्य को शिक्षा के अधिकार से वंचित किया जा सकता है तो लोधी व्यक्ति को भी कौन प्रेम पूर्वक शिक्षा दे सकता होगा? वही दुत्कार और उपेक्षा ही उसे मिली और मिलती आई।
इस प्रकार लोधी जाति एकअविकसित,अप्रगतिशील और लकीर की फकीर रूढ़िवादी जाति बनकर रह गई।
शिक्षा विकास का प्रथम सूत्र है, जो पुराने संस्कारवश उसे प्राप्त नहीं हो सका। यही संस्कार उसका वर्तमान भविष्यऔरअतीत बन गया।उसमें जड़वादिता का कीड़ा पनपने लगा अर्थात आगे बढ़ने की सोचने की क्षमता ही समाप्त हो गई। शिक्षा मानव को प्रगतिशील होने के नए नए मार्ग खोलती है। उसकी बुद्धि का विकास करती है। उसके अंदर वैज्ञानिक तरीके से कार्य करने की बुद्धि का विकास करती है।अपने अंदर ही अंदर सिमटकर रह जाने की कछुआवृत्ति का विनाश करती है। लोधी जाति की यह कछुआवृत्ति ही उसके विकास की बाधक है। इस कछुआवृत्ति का विनाश तब तक नहीं हो सकता , जब तक लोधी अपने मुँह को शिक्षा की ओर नहीं मोड़ लेते।
प्राचीन काल से ही लोधी खेती -किसानी , पशुपालन, शाक सब्जी उत्पादन औऱ विक्रय करके ही संतुष्ट रहे।परम् संतोष वादिता इस जाति का एक विशेष गुण है, जो आज के युग में उसका अवगुण बन चुका है।इतना संतोष भी किस काम? जो विकास के कदमों में बेड़ियाँ ही डाल दे!
जो जाति समय की गति के साथ नहीं चल पाती, युग के साथ कदम से कदम नहीं मिला पाती, उसका पिछड़ जाना स्वाभाविक है।यही कम या ज्यादा समस्त पिछड़ी जातियों के साथ हुआ है। लोधी जाति के साथ कुछ न्यादा ही हुआ।लोधी जागरण के ब्रह्म मुहूर्त में भी सोता रहा, और आज भी सो ही रहा है। जागरूकता न आने के बहुत से कारणों में पहला औऱ प्रबल कारण है शिक्षा के प्रति उदासीनता।इस जाति को सही दिशा देने वाले पथ-प्रदर्शकों का अभाव।जो आज शिक्षित और किसी क्षेत्र में आगे हैं , वे अपने और अपने परिवार के विकास के बीच सिमट कर रह गए हैं।वहाँ भी जातिगत कछुआवृत्ति ही काम कर रही।अंगुलियों पर गिनने योग्य कुछ स्वजातीय बन्धुओं को छोड़कर कोई भी किसी को रास्ता नहीं बता रहा। धीरे-धीरे पथ-,प्रदर्शन का रथ आगे बढ़ रहा है।जिससे कुछ आशा की किरणें जागीं हैं।
हमारे संस्कारों से ही हमारी संस्कृति का विकास होता है। संस्कृति के विकास के पहिए की गति बहुत मंद मंद है। हजारों वर्षों से बने हमारे लोधी संस्कारों को इतनी सहजता और सरलता से नहीं बदला जा सकता।इसके लिए सैकड़ों वर्षों की आवश्यकता है।'करत - करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।रसरी आवत जात के सिल पर परत निसान।' के अनुसार अगर संघर्ष जारी रहा तो कोई कारण नहीं कि लोधी समाज आज के समाजों के साथ कदम से कदम मिला कर न चल सके।
शिक्षा से संस्कार बदलें , संस्कृति स्वतः बदल जाएगी।जब हम सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़े हुए रहते हैं , तो सभ्यता भी पिछड़ जाती है। हमें केवल संस्कार बदलने के लिए अच्छी शिक्षा ग्रहण करनी है। संस्कार ,संस्कृति और सभ्यता स्वयं बदल जाएगी।तो आइए एक कदम सुशिक्षा की ओर बढ़ाएं। अपनी हीनता बोध की भावना को नष्ट करें।हम किसी से कम सिद्ध नहीं होंगे।अपने लक्ष्य की ओर अपनी पैनी दृष्टिं गड़ाए हुए आगे बढें,कल हमारा होगा।निराशावाद के कुहासे को फाड़कर आगे आएं।
"चरैवेति चरैवेति".
💐शुभमस्तु!
✍🏼लेखक©डॉ.भगवत स्वरूप राजपूत "शुभं"
शिक्षा विकास का प्रथम सूत्र है, जो पुराने संस्कारवश उसे प्राप्त नहीं हो सका। यही संस्कार उसका वर्तमान भविष्यऔरअतीत बन गया।उसमें जड़वादिता का कीड़ा पनपने लगा अर्थात आगे बढ़ने की सोचने की क्षमता ही समाप्त हो गई। शिक्षा मानव को प्रगतिशील होने के नए नए मार्ग खोलती है। उसकी बुद्धि का विकास करती है। उसके अंदर वैज्ञानिक तरीके से कार्य करने की बुद्धि का विकास करती है।अपने अंदर ही अंदर सिमटकर रह जाने की कछुआवृत्ति का विनाश करती है। लोधी जाति की यह कछुआवृत्ति ही उसके विकास की बाधक है। इस कछुआवृत्ति का विनाश तब तक नहीं हो सकता , जब तक लोधी अपने मुँह को शिक्षा की ओर नहीं मोड़ लेते।
प्राचीन काल से ही लोधी खेती -किसानी , पशुपालन, शाक सब्जी उत्पादन औऱ विक्रय करके ही संतुष्ट रहे।परम् संतोष वादिता इस जाति का एक विशेष गुण है, जो आज के युग में उसका अवगुण बन चुका है।इतना संतोष भी किस काम? जो विकास के कदमों में बेड़ियाँ ही डाल दे!
जो जाति समय की गति के साथ नहीं चल पाती, युग के साथ कदम से कदम नहीं मिला पाती, उसका पिछड़ जाना स्वाभाविक है।यही कम या ज्यादा समस्त पिछड़ी जातियों के साथ हुआ है। लोधी जाति के साथ कुछ न्यादा ही हुआ।लोधी जागरण के ब्रह्म मुहूर्त में भी सोता रहा, और आज भी सो ही रहा है। जागरूकता न आने के बहुत से कारणों में पहला औऱ प्रबल कारण है शिक्षा के प्रति उदासीनता।इस जाति को सही दिशा देने वाले पथ-प्रदर्शकों का अभाव।जो आज शिक्षित और किसी क्षेत्र में आगे हैं , वे अपने और अपने परिवार के विकास के बीच सिमट कर रह गए हैं।वहाँ भी जातिगत कछुआवृत्ति ही काम कर रही।अंगुलियों पर गिनने योग्य कुछ स्वजातीय बन्धुओं को छोड़कर कोई भी किसी को रास्ता नहीं बता रहा। धीरे-धीरे पथ-,प्रदर्शन का रथ आगे बढ़ रहा है।जिससे कुछ आशा की किरणें जागीं हैं।
हमारे संस्कारों से ही हमारी संस्कृति का विकास होता है। संस्कृति के विकास के पहिए की गति बहुत मंद मंद है। हजारों वर्षों से बने हमारे लोधी संस्कारों को इतनी सहजता और सरलता से नहीं बदला जा सकता।इसके लिए सैकड़ों वर्षों की आवश्यकता है।'करत - करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।रसरी आवत जात के सिल पर परत निसान।' के अनुसार अगर संघर्ष जारी रहा तो कोई कारण नहीं कि लोधी समाज आज के समाजों के साथ कदम से कदम मिला कर न चल सके।
शिक्षा से संस्कार बदलें , संस्कृति स्वतः बदल जाएगी।जब हम सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़े हुए रहते हैं , तो सभ्यता भी पिछड़ जाती है। हमें केवल संस्कार बदलने के लिए अच्छी शिक्षा ग्रहण करनी है। संस्कार ,संस्कृति और सभ्यता स्वयं बदल जाएगी।तो आइए एक कदम सुशिक्षा की ओर बढ़ाएं। अपनी हीनता बोध की भावना को नष्ट करें।हम किसी से कम सिद्ध नहीं होंगे।अपने लक्ष्य की ओर अपनी पैनी दृष्टिं गड़ाए हुए आगे बढें,कल हमारा होगा।निराशावाद के कुहासे को फाड़कर आगे आएं।
"चरैवेति चरैवेति".
💐शुभमस्तु!
✍🏼लेखक©डॉ.भगवत स्वरूप राजपूत "शुभं"
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