लोधी जाति के पतन औऱ अप्रगतिशीलता के बहुत से कारणों में से एक है - लोधी जाति की विवाह परम्परा। सभी जानते और देखते हैं कि इस समाज में सगोत्र विवाह किए जाने की रूढ़ि की जलकुंभी लोधी-सरोवर पर आच्छादित है। कोई भी इस विवाह परम्परा पर विचार करने को तैयार नहीं है। बड़े -बड़े स्वजातीय नेता, विधायक, सांसद, मंत्री औऱ अधिकारी गण इस बिंदु पर मौन हैं।सम्मेलनों में लंबे -चौड़े भाषण किए जाते हैं , पर इस विषय पर कोई कुछ नहीं कहना चाहता। सभी गधे को गंगा में डुबकी लगवाकर गाय बनाने में लगे हुए हैं।युग -युग से लोधी संस्कार लड़ने -भिड़ने और खेती किसानी का रहा है। इसे सभी मानते हैं।इसलिए यदि वे परस्पर लड़ भिड़कर कोर्ट -कचहरी की शोभा बढ़ा रहे हैं तो आश्चर्य क्या ! उनका संस्कार लड़ने का है, पढ़ने का नहीं। न जाने कौन युग से सगोत्र विवाह की परंपरा पूर्वजों ने डाली होगी औऱ क्यों? कुछ भी कहा नहीं जा सकता।लेकिन अन्य उच्च जातियों और विवाह परम्पराओं की ओर दृष्टिपात किया जाए तो हम सभी बहुत पीछे हैं।
आज भी पथरिया पथरिया ही ढूंढता है, मथुरिया मथुरिया की खोज में भटकता है, किन्तु स्वगोत्र से इतर गोत्र में जाने की सोच भी नहीं सकता। इतर गोत्र विवाह करने पर अगली संतान में गुणसूत्र परिवर्तन होता है,इससे तीव्र बुद्धि, स्वस्थ शरीर के प्रतिभाशाली बच्चे जन्म लेते हैं।डी एन ए परिवर्तन से जातीय संस्कार भी बदलते हैं। इस विषय पर कहीं कोई गोष्ठी, बैठक, सम्मेलन नहीं होता।बस कैसे आई ए एस बनें , ये सिखाया जाता हैं। जड़ें कमजोर हैं, बच्चा संस्कार विहीन है, तो उसे कलक्टर कैसे बनाओगे।वह ढंग से स्कूल कालेज की पढ़ाई भी पूरी कर पाए ,उससे यही अपेक्षा है। लेकिन हमारे तथाकथित नेता और पथप्रदर्शक लोग उन्हें आई पी एस , आई ए एस के सूत्र समझाना चाहते हैं। पहले संस्कारों की जड़ों में खाद लगाने के लिए अंतरजातीय औऱ अन्तरगोत्रीय विवाह परम्परा पद्धति लागू करनी होगी।दुनिया औऱ अन्य समाजों की ओर देखकर जाति का D N A बदलना होगा।अन्यथा लोधी जाति को सुधरने में सदियाँ बीत जाने पर भी संदेह रहेगा। भाषणों और कोरी दावत खाउ सम्मेलनों से कुछ भी नहीं होने वाला। संस्कार से विचार बदलेगा, विचार से आचार बदलेगा , आचार से समाज का वैवाहिक परिवार बदलेगा औऱ परिवार से हमारा विकार झुलसेगा।मंचीय भाषण तब सार्थक होने लगेंगे।
देखा होगा पेड़ों में व अन्य वनस्पतियों में कलम लगाकर नई वेरायटी तैयार की जाती है, यही बात मानव जाति और लोधी जाति पर भी लागू होती है।पशुओं की नस्ल सुधारने के लिए अन्य नस्ल के नरों से क्रॉस कराके सफलता पाई जाती है। विज्ञान के युग में विज्ञान के इन सिद्धांतों को पालन करना ही होगा, अन्यथा भाषणों से विकास असम्भव है।
💐शुभमस्तु!
✍🏼लेखक ©:डॉ. भगवत स्वरूप राजपूत "शुभम"
आज भी पथरिया पथरिया ही ढूंढता है, मथुरिया मथुरिया की खोज में भटकता है, किन्तु स्वगोत्र से इतर गोत्र में जाने की सोच भी नहीं सकता। इतर गोत्र विवाह करने पर अगली संतान में गुणसूत्र परिवर्तन होता है,इससे तीव्र बुद्धि, स्वस्थ शरीर के प्रतिभाशाली बच्चे जन्म लेते हैं।डी एन ए परिवर्तन से जातीय संस्कार भी बदलते हैं। इस विषय पर कहीं कोई गोष्ठी, बैठक, सम्मेलन नहीं होता।बस कैसे आई ए एस बनें , ये सिखाया जाता हैं। जड़ें कमजोर हैं, बच्चा संस्कार विहीन है, तो उसे कलक्टर कैसे बनाओगे।वह ढंग से स्कूल कालेज की पढ़ाई भी पूरी कर पाए ,उससे यही अपेक्षा है। लेकिन हमारे तथाकथित नेता और पथप्रदर्शक लोग उन्हें आई पी एस , आई ए एस के सूत्र समझाना चाहते हैं। पहले संस्कारों की जड़ों में खाद लगाने के लिए अंतरजातीय औऱ अन्तरगोत्रीय विवाह परम्परा पद्धति लागू करनी होगी।दुनिया औऱ अन्य समाजों की ओर देखकर जाति का D N A बदलना होगा।अन्यथा लोधी जाति को सुधरने में सदियाँ बीत जाने पर भी संदेह रहेगा। भाषणों और कोरी दावत खाउ सम्मेलनों से कुछ भी नहीं होने वाला। संस्कार से विचार बदलेगा, विचार से आचार बदलेगा , आचार से समाज का वैवाहिक परिवार बदलेगा औऱ परिवार से हमारा विकार झुलसेगा।मंचीय भाषण तब सार्थक होने लगेंगे।
देखा होगा पेड़ों में व अन्य वनस्पतियों में कलम लगाकर नई वेरायटी तैयार की जाती है, यही बात मानव जाति और लोधी जाति पर भी लागू होती है।पशुओं की नस्ल सुधारने के लिए अन्य नस्ल के नरों से क्रॉस कराके सफलता पाई जाती है। विज्ञान के युग में विज्ञान के इन सिद्धांतों को पालन करना ही होगा, अन्यथा भाषणों से विकास असम्भव है।
💐शुभमस्तु!
✍🏼लेखक ©:डॉ. भगवत स्वरूप राजपूत "शुभम"
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